वाईजैक गैस लीक भारत में रसायनिक आपदा

चर्चा में क्यों? 
हालही में आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम से15 किलोमीटर दूर स्थित LG polymer Indian में गैस रिसाव का मामला सामने आया इस हादसे में दर्जनभर लोगों की मृत्यु और भारी संख्या में लोग बीमार पड़ गए हैं। 



​वहीं छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में स्थित पेपर मिल में भी विषैली गैस के रिसाव का मामला प्रकाश में आया है, जिसमें 7 लोग चपेट में आए। मिल में टैंक की सफाई के दौरान गैस रिसाव होने की खबर सामने आ रही है। 

​                   कहने की जरूरत नहीं कि जानलेवा गैस रिसाव के कारण जनधन की हानि होने से एक बार फिर उद्योगों की सुरक्षा मानकों पर सवाल खड़े किए  हैं, इस घटना ने एक बार फिर से 36 वर्ष पहले हुए भोपाल गैस हादसे की दुखद यादें ताजा कर दी है जिसमें मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव के कारण हजारों लोगों की जान चली गई , हजारों लोग उस त्रासदी का खामियाजा विकलांगता और अन्य गंभीर रूप में आज भी भुगत रहे है।
विशाखापट्टनम की हालिया घटना से हमें ये पता चलता है कि दुनिया की बड़ी औद्योगिक घटनाओं में सुमार भोपाल गैस त्रासदी में कोई सबक नहीं सीखा।
भोपाल की घटना के बाद कई कानून बने, लेकिन विडंबना ये है कि औद्योगिक दुर्घटनाओं से सुरक्षा जैसे गंभीर मसले पर हम अभी तक संजीदा नहीं हो सके है, और हमेशा ऐसी बड़ी दुर्घटनाओं के बाद ही देश में विचार-विमर्श का द्वार शुरू होता है, यानी कहीं ना कहीं देश के कानून में बेहतर क्रियान्वयन का अभाव है ।
दूसरी तरफ सघन अबादी के बीचो-बीच ऐसी केमिकल कंपनियों की स्थापना का होना भी चिंता का विषय है।

भोपाल की यूनियन कार्बाईड की तरह एलजी पॉलीमर्स भी घनी आबादी के बीच स्थित है, इससे नागरिकों की सुरक्षा के स्तर का भी पता चलता है ।
   सवाल है , इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तरफ रोजगार की उम्मीद से तो देखा जाता है लेकिन नागरिकों की जान की कीमत पर कंपनियों की स्थापना सरकार और प्रशासन में गंभीरता की कमी को दिखाता है, जाहिर है सरकार को कई मोर्चों पर संजीदगी से विचार विमर्श करने की जरूरत है।
गैस रिसाव का पूरा मामला
 वर्ष 1961 में स्थित हुई  LG polymers india का नाम हिंदुस्तान पॉलीमर था। यह आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम से 15 किलोमीटर दूर गोपालपटनम में स्थित है, यह मूलता दक्षिण कोरिया की कंपनी है, यह कंपनी पॉलीमर के क्षेत्र में विकास, निर्माण, सेवाओ का नेतृत्व करती है। यहां polystyrene (  पॉलीस्टेरीन ) और प्लास्टिक यौगिकों का निर्माण किया जाता है, दरासल पॉलीस्टेरीन, स्टाईरीन नामक कार्बनिक योगिक का बहुलक (polymer) होता है।
स्टाईरीन का केमिकल फॉर्मूला C8H8 होता हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो इस स्टाईरीन कार्बन और हाइड्रोजन का योंगिक यानी एक हाइड्रोकार्बन है, और यह बेंजीन यानी C6H6 का व्योत्पन्न (derivative) है।
इसे कारखानों में तरल के रूप में संग्रहित किया जाता है तथा इस का तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से कम रखा जाता है,लेकिन यह आसानी से वास्पित हो जाता है।
स्टाईरीन मुख्य रूप से एक सिंथेटिक रसायन है, ईसे विनाइल वेंजीन , एथेनाइल वेंजीन, या फिनायल ईथेनिल के रूप में भी जाना जाता है।  यह एक रंगहीन और ज्वलनशील तरल है और इसमें एक मीठी गंध होती है।इसमें अक्सर दूसरे रसायन मिलाएं भी जाते हैं, जो इसे तेज और अप्रिय गंध भी देते हैं, यह कुछ तरल पदार्थों में घुल जाता है लेकिन पानी में आसानी से नहीं घुलता है।

स्टाईरीन के अल्पकालिक संपर्क से सांस संबंधी समस्या आंखों में जलन आदि समस्याएं पैदा हो सकती है, जबकि दीर्घकालिक संपर्क होने से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो सकता है और कुछ मामलों में तो ल्योकेमिया भी हो सकता है। स्टाईरीन से उत्पन्न होने वाले लक्षणों में सिरदर्द, थकान, कमजोरी महसूस करना आदि है, यही कारण है कि इसका रिसाव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
भारत में रासायनिक आपदा का इतिहास
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के मुताबिक भारत में बीते वर्षों में 130 रासायनिक दुर्घटनाएं दर्ज हुई हैं, इन घटनाओं में 250 से ज्यादा मौतें हुई है।
​        आंध्र प्रदेश की बात करें तो औद्योगिक घटनाओं के मामले में यहां की प्रमुख औद्योगिक केंद्र का ट्रैक रिकॉर्ड निराशाजनक रहा है।

1997 में एचपीसीएल (HPCL) रिफाइनरी विस्फोट में 60 लोगों की मृत्यु हुई थी। वहीं 2012 में एक स्टील प्लांट में oxygen house विस्फोट के कारण 19 लोग हताहत हुए थे।
दिसंबर 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी दुनिया की बड़ी औद्योगिक घटनाओं में से एक है। भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड प्लांट में मिथाइल आइसोसाइनेट नामक जहरीली गैस लीक हुई।
इस हादसे में 5 लाख से ज्यादा लोग आहत हुए थे 3000 से ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई थी।

इसके ठीक एक साल बाद दिल्ली में Shriram food and fertilisers  नामक कंपनी में ओलिवीयम गैस के रिसाव होने से एक व्यक्ति की मौत हो गई थी।
हाल ही के वर्षो में पुणे में क्लोरीन रिसाव , भिलाई स्टील प्लांट में गैस रिसाव, और रत्नागिरी में अमोनिया गैस रिसाव मैं भी जनधन की हानि हुई, कुल मिलाकर देखें तो भारत में रसायनिक आपदा का इतिहास बड़ा पुराना है और यहां ऐसे  छोटे बड़े हादसे होते रहे हैं, मगर हम इन हादसों से सबक लेकर उद्योगों के सुरक्षा मानकों के प्रति गंभीर नहीं हो सके।

भारत में रसायनिक त्रासदी से संबंधित कानून 
  भोपाल गैस त्रासदी के संबंध में रसायनिक घटनाओं के दोषियों को सजा दिलाने के लिए कोई  कानून नहीं था, तब भोपाल गैस त्रासदी के समय दोषियों को  सजा दिलाने के लिए मात्र एक प्रासंगिक कानून भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) (IPC) ही था, जिसके तहत अपराधियों की जवाबदेही तय की जा सकती थी, CBi ने शुरू में भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत आरोपियों पर केस दर्ज किया, बाद में धारा 304ए के तहत आरोप तय किए गए जो लापरवाही के कारण होने वाली मौत से संबंधित थे, इसके तहत अधिकतम 2 साल की सजा और जुर्माना लगाया जाता है। इस त्रासदी के तुरंत बाद ही सरकार ने पर्यावरण को वीनियमित करने और सुरक्षा उपायो और दंडो को निर्दिष्ट करने के लिए  बहुत से कानून बनाए गए।

1985 में The Bhopal gas leak disaster (processing of claims) Act 1985 बनाया गया इसके तहत केंद्र सरकार को यह शक्ति दी गई क्षतिपूर्ति के दावेदारों की ओर से समझौता कर सकती है यह कानून केंद्र सरकार को भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े समझौतों को सुरक्षित रखने के लिए शक्तियां प्रदान करता है अधिनियम के प्रावधानों के तहत क्षतिपूर्ति या मुआवजा के दावों का तेजी तथा न्यायसंगत तरीके से निपटान करने का प्रावधान किया गया।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की बनाया गया मैं कानून केंद्र सरकार को औद्योगिक इकाइयों के लिए पर्यावरण सुधार को अपनाने मांगों को निर्धारित करने और निरीक्षण करने की शक्तिया देता है।
The the public liability insurance act 1991
खतरनाक पदार्थों से निपटान के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं से प्रभावित व्यक्तियों को राहत प्रदान करने का प्रावधान दिया गया।
आगे चलकर राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण 1997 का भी निर्माण किया गया इसके तहत राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय क्षेत्रों  पर प्रतिबंध लगाने की अपील सुन सकता है जहा किसी भी औद्योगिक प्रतिक्रिया पर काम नहीं किया जा सकता है इसके अलावा उन अपीलों पर भी सुनवाई कर सकता है जिनमें पर्यावरण अधिनियम 1986 के तहत अपनाए गए सुरक्षा उपायों के अधीन उन क्षेत्रों में औद्योगिक कार्यों को अमल में लाया जा सकता है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम 2010 उसका मकसद पर्यावरण संरक्षण और वनों के संरक्षण से संबंधित मामलों का प्रभावी और शीघ्र निपटान करना था यह अधिकरण औद्योगिक गतिविधियों के संबंध में भी आवश्यक निर्देश देने का कार्य करता है यही कारण है कि विशाखापट्टनम की घटना सामने आते ही राष्ट्रीय हरित अधिकरण सक्रिय हो गया और संबंधित कंपनी पर ₹50 करोड़ रुपए का जुर्माना लगा दिया।  
लेकिन चिंता है कि इन तमाम कानूनों के बावजूद देश में छोटी-बड़ी ऐसी रसायनिक आपदाओं को रोकने में सरकारे नाकाम रही है।
भविष्य के लिए क्या तैयारियां होनी चाहिए ?

किसी भी रासायनिक आपदा के कई संभावित कारण हो सकते हैं, यह हादसे कई तरह की त्रुटियां जैसे की  मानवीय कारण ,तकनीकी कारण, प्रबंधन संबंधी कारण आदि की लापरवाही हो सकती है।
भोपाल गैस हादसे भी इन्हीं गलतियों का नतीजा था लेकिन विडंबना है कि ऐसे हादसों की लापरवाही के लिए किसी को भी ऐसे दंड दिए जाने का मामला अब तक सामने नहीं आया है जो दोषियों में डर पैदा करने वाली सबक बन सके कानूनों को ताक पर रखने का नतीजा है जिस तरह की समझ और सावधानी भोपाल हादसे के बाद से हमारे उद्योगिक व्यवहरिक में आनी चाहिए थी वह नहीं आई है ऐसे में भोपाल हादसे के बाद बने कानूनों का बेहतर क्रियान्वयन की एक उपाय है। 

कानूनों पर संजीदगी से अमल को जरूरी है ही कानूनों में जरूरी संशोधन की भी जरूरत है 2010 में the civil liability for nuclear damage act अस्तित्व में आया लेकिन इस कानून में केवल न्यूक्लियर दुर्घटनाओं में होने वाली छति कि ही पूर्ति करने का प्रावधान है लिहाजा इस कानून में संशोधन कर गैर न्यूक्लीयर दुर्घटनाओं की छतिपूर्ति के प्रावधानों को भी शामिल करने की जरूरत है
वहीं दूसरे अन्य कानूनों में सजा की धारा को सख्त बनाने की जरूरत है ताकि रासायनिक संयंत्रों में लापरवाही बरतने वालों को डर बना रहे।

The public liability insurance act 1991 environment relief fund की भी स्थापना की गई इसका मकसद ऐसे हादसों में प्रभावित होने वाले लोगों को फौरन राहत पहुंचाना है।  लिहाजा इस फंड की राशि का इस्तेमाल करके विशाखापट्टनम में पीड़ित लोगों को फौरन राहत पहुंचानी चाहिय उधर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने भी रसायनिक दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कुछ दिशा निर्देश जारी किए। कच्चे माल के रूप में खतरनाक रसायनिक उपयोग करने वाली  कंपनियों को onside or offside अपातकालीन योजना बनानी चाहिए, एवं नियमित मोगद्रिल का आयोजन कर इसका टेस्ट करना होगा। कंपनी के पास कौशल माध्यम शक्ति एवं बेहतरीन अवसंरचना होनी चाहिए।  ताकि किसी भी स्तर पर रसायनिक दुर्घटनाओं को रोका जा सके साथ ही साथ कंपनी के लिए सेफ्टी ऑडिट करना भी अनिवार्य किया है इससे ऐसी दुर्घटनाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए जरूरी है ऐसे प्लांट आबादी से दूर स्थापित किए जाए LG polymer कंपनी के आसपास सघन आबादी है भोपाल हादसे यूनियन कार्बाइड कंपनी की आबादी के बीच की स्थित थी । शायद ऐसे विषैली कारखाने के पास रहने वाले आबादी को सही जागरूक या प्रशिक्षित नहीं किया जा रहा है या फिर यह जागरूकता सिर्फ दिखावा मात्र है अन्यथा इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौत नहीं होती अपने सिरे से यह सुनिश्चित करना चाहिए की ऐसे कारखाने आबादी के बीच ना रहे । ऐसे कारखाने कहीं भी खोजने के बजाय एक निश्चित क्षेत्र में सुरक्षित ढंग से बनाया जाए ।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार

विशाखापट्टनम स्थित एलजी पॉलीमर के खिलाफ भी पर्यावरण प्रदूषण सहित कई मामले दर्ज किए गए थे, मगर इन्हें कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। दावा यह भी है कि इस कंपनी के पास पेट्रोकेमिकल प्लांट के लिए 1997 और 2019 के दौरान परिचालन के लिए पर्यावरण मंजूरी भी नहीं थी । यानी कंपनी ने बिना किसी पर्यावरण मंजूरी के अपना काम जारी रखा था, और लोगों के स्वास्थ्य के साथ धोखा किया जा रहा था, पर किसी को भनक तक नहीं लगी ।जाहिर है, यहसब कुछ बिना स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत के मुमकिन नहीं यानी भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भी पर्यावरण कानून को कमजोर कर रही है। एलजी पॉलीमर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी है, और ऐसी कंपनियों के आने से इन्हें रोजगार की इजाफे के लिए देखा जाता है। मौजूदा कोरोना संकट के बाद चीन के प्रति उपजे अविश्वास के चलते चीन छोड़ कर जा रही।
 बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत लाने के प्रयास किए जा रहे हैं इन सभी मामले में हमारी सरकारे औद्योगिक और नागरिक सुरक्षा की अनदेखी कर देती है इसलिए इन कंपनियों की सुरक्षा की जवाबदेही तय किया जाना जरूरी है, सभीके लिए कोरोना संकट में बड़ा रोजगार संकट खड़ा कर दिया है, लेकिन सुरक्षा के मानकों पर किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता, इसलिए सरकार  उद्योगों की सुरक्षा मानकों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
सरकार कंपनी और  स्थानीय प्रशासनिक या सुनिश्चित करना होगा ऐसे हादसे देश में फिर कभी ना हो।
धन्यवाद 🙏
शिवशक्ति पांडेय
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Comments

  1. Thanku for giving me a information pandey ji you writing a good block

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